Why Varanasi Is Made The Axis Of Up Election Up Assembly Election 2017 – यूपी चुनाव में पीएम मोदी के लिए बनारस क्यों बना साख का सवाल?



Why Varanasi Is Made The Axis Of Up Election Up Assembly Election 2017

वाराणसी के चुनावी नतीजे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़े जाएंगे इसलिए बीजेपी वहां कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती. छह चरणों के चुनाव पर सातवां भारी पड़ गया. काशी सियासी रणभूमि में बदल गई.
पूरे चुनाव में पीएम ने प्रचार के दौरान कहीं और रात नहीं गुजारी. न ही इतना समय दिया. लेकिन वाराणसी को प्रतिष्‍ठा का विषय बना लिया. आरएसएस और बीजेपी की जंबो टीम वहां कैंप कर रही है. बनारस के कुल 8 विधानसभा सीट में अभी बीजेपी के पास 03, बीएसपी व सपा के पास 2-2 और कांग्रेस के पास एक सीट है.

पूरे चुनाव में पीएम ने प्रचार के दौरान कहीं और रात नहीं गुजारी. न ही इतना समय दिया. लेकिन वाराणसी को प्रतिष्ठां का विषय बना लिया. चुनावी चक्रव्यूिह का अंतिम द्वार तोड़ने के लिए पीएम मोदी का तीन दिन काशी में ठहरना न सिर्फ विपक्षियों को अखर रहा है बल्किन कई संदेश भी दे रहा है.

बीजेपी ने अपने तीन मौजूदा विधायकों में से दो लोगों का टिकट काट दिया है. इसमें शहर दक्षिणी से सात बार विधायक रहे श्‍यामदेव राय चौधरी ‘दादा’ का टिकट भी शामिल है. टिकट बंटवारे से भाजपा कार्यकर्ताओं में उपजी नाराजगी को विपक्षियों ने खूब भुनाने की कोशिश हुई है. चुनावी चक्रव्‍यूह का अंतिम द्वार तोड़ने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का तीन दिन काशी में ठहरना न सिर्फ विपक्षियों को अखर रहा है बल्‍कि कई संदेश भी दे रहा है.
जानिए बनारस की आठ सीटों का क्‍या गणित है.
शिवपुर:
वर्ष 2012 में यहां बीएसपी के उदयलाल मौर्य 26.45 फीसदी वोट लेकर विधायक बने थे. 19.59 फीसदी वोट लेकर सपा के पीयूष यादव दूसरे स्‍थान पर रहे थे. कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह को 17.66 फीसदी वोट मिले थे. भाजपा प्रत्‍याशी आरपी कुशवाहा 6.77 फीसदी वोट लेकर छठे स्‍थान पर थे. कांग्रेस और अपना दल की स्‍थिति भाजपा से अच्‍छी थी. यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन का वोट मिलकर किसी का भी खेल बिगाड़ सकते हैं. उदयलाल मौर्य बसपा छोड़कर सपा में आए थे लेकिन उन्‍हें टिकट नहीं मिली. ऐसे में भाजपा के खिलाफ भितरघात की भी संभावना है. यहां सपा छोड़कर आए अनिल राजभर भाजपा से प्रत्‍याशी हैं.

अजगरा (अजा):
वर्ष 2012 में इस सीट पर बीएसपी के त्रिभुवन राम विधायक थे. उन्‍होंने 32.35 फीसदी वोट हासिल किया था. यहां समाजवादी पार्टी के लालजी ने 31.23 फीसदी वोट लिया था. बीजेपी के हरिनाथ 12.27 फीसदी वोट लेकर तीसरे स्‍थान पर रहे थे.
अब भाजपा ने प्रधानमंत्री के गृह क्षेत्र की यह सीट भारतीय समाज पार्टी (भासपा) के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ओम प्रकाश राजभर को दे दी है. राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि पार्टी को पहले ही लग गया था कि इस सीट पर उसकी दाल नहीं गलने वाली है इसलिए उसने सहयोगी पार्टी को सौंप दी. यहां भासपा-भाजपा से कैलाशनाथ सोनकर प्रत्‍याशी हैं.
 रोहनिया:
वर्ष 2012 में यहां पर अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने 30.22 फीसदी वोटों के साथ जीत दर्ज की थी. उस वक्‍त बीजेपी के संजय राय 9.67 फीसदी वोट लेकर चौथे स्‍थान पर थे. बसपा और सपा की स्‍थिति भी अच्‍छी थी. बीएसपी को 21.03 और सपा को 13.64 फीसदी वोट मिले थे.
लोकसभा चुनाव के बाद 2014 में ही हुए यहां के उप चुनाव में बीजेपी की लहर के बावजूद इस सीट पर सपा के महेंद्र सिंह पटेल ने कब्‍जा किया. इस बार यहां अपना दल की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष कृष्‍णा पटेल बेटी अनुप्रिया पटेल से मनमुटाव के बाद खुद मैदान में हैं.
जबकि भाजपा और अनुप्रिया की अगुआई वाले अपना दल (सोनेलाल) के सुरेंद्र नारायण सिंह भी मैदान में हैं. सपा कांग्रेस गठबंधन से महेंद्र पटेल प्रत्‍याशी हैं.

पिंडरा:
इस सीट पर 2012 में कांग्रेस के अजय राय ने जीत दर्ज की थी. उन्‍होंने 29.31 फीसदी वोट लेकर बीएसपी के जय प्रकाश को हराया था. भाजपा के पूर्णमासी को सिर्फ 1.84 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा था. वह यहां पांचवें नंबर पर थे.
यहां अपना दल और समाजवादी पार्टी की स्‍थिति भाजपा से बहुत अच्‍छी थी. कांग्रेस-सपा गठबंधन ने पांच बार विधायक रहे अजय राय का रास्‍ता इस बार भी आसान कर दिया है. यहां भाजपा से प्रो. अवधेश सिंह प्रत्‍याशी हैं. भाजपा को यहां परंपरागत और सवर्ण वोटों से उम्‍मीद है. बसपा के बाबूलाल पटेल को यहां के पटेल वोटों का सहारा है.
 सेवापुरी:
2012 में इस सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्‍जा था. सपा के सुरेंद्र सिंह पटेल ने 31.87 फीसदी वोट लेकर 2012 में अपना दल के नील रतन पटेल को हराया था. 5.50 फीसदी वोट लेकर बीजेपी के देवेंद्र प्रताप छठे नंबर पर थे.
बीएसपी तीसरे, कांग्रेस चौथे और कौमी एकता दल का प्रत्‍याशी पांचवें नंबर पर था. 2012 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे नीलरतन पटेल इस बार यहां अपना दल (सोनेलाल)-भाजपा गठबंधन के प्रत्‍याशी हैं.
 
वाराणसी कैंट:
यह सीट वर्ष 1991 से लगातार बीजेपी के पास है. दूसरे नंबर पर जनता दल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जगह बनाते रहे हैं. वर्ष 2012 में 32.05 फीसदी वोट लेकर बीजेपी की ज्‍योत्‍सना श्रीवास्‍तव विधायक बनी थीं. इस सीट पर कांग्रेस को 24.94 और समाजवादी पार्टी को 20.99 फीसदी वोट मिले थे.
इसलिए सपा और कांग्रेस का गठबंधन इस सीट पर भाजपा के लिए मुश्‍किल खड़ी कर सकता है. अपना दल को इस सीट पर सिर्फ एक फीसदी 1800 वोट यानी 01 फीसदी वोट मिले थे. इस बार यहां त्रिकोणीय मुकाबला बताया जा रहा है. इस बार यहां ज्‍योत्‍सना के बेटे सौरभ श्रीवास्‍तव भाजपा प्रत्‍याशी हैं.
 शहर उत्‍तरी:
2012 में इस सीट पर बीजेपी का कब्‍जा था. 26.49 फीसदी वोट लेकर रविंद्र जयसवाल विधायक बने थे. बीएसपी के सुजीत कुमार मौर्य 25.20 फीसदी वोट लेकर दूसरे स्‍थान पर थे. कांग्रेस और सपा गठबंधन के बाद यह सीट भाजपा के हाथ से फिसलती नजर आ रही है.
इस सीट पर 1996 से 2007 तक समाजवादी पार्टी का कब्‍जा रह चुका है. उसका वोटबैंक बना हुआ है. 2012 में यहां सपा को 20.67 और कांग्रेस को 17.13 फीसदी वोट मिले थे. यदि दोनों का वोट जुटता है तो फिर बीजेपी मुश्‍किल में फंस सकती है. यहां 2012 में पहली बार विधायक बने भाजपा से रविंद्र जयसवाल फिर मैदान में हैं. पार्टी संगठन उनके साथ है, लेकिन दो बागी प्रत्‍याशियों ने उनके रास्‍ते में कांटे बिछा दिए हैं.
 
शहर दक्षिणी:
यह बीजेपी की पारंपरिक सीट मानी जाती है. दादा के नाम से मशहूर श्‍यामदेव राय चौधरी 1989 से लगातार विधायक रहे हैं. लेकिन इस बार उनका टिकट कट गया है. वह नाराज बताए जा रहे हैं. इसलिए बीजेपी को नुकसान की आशंका है. इस बार यहां नीलकंठ तिवारी भाजपा से प्रत्‍याशी हैं. भितरघात उन्‍हें परेशान कर रहा है.
कांग्रेस और सपा दोनों यहां दूसरे नंबर पर आते रहे हैं. 2012 के चुनाव में यहां कांग्रेस के दयाशंकर मिश्र ने 29.09 और सपा के मोहम्‍मद इस्‍तकबाल ने 9.67 फीसदी वोट हासिल किए थे. कौमी एकता दल को यहां पर 13.51 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इन सभी के वोटबैंक को मिलाने पर बीजेपी खतरे में पड़ सकती है.