Social Engineering Of Political Parties In Up Assembly Election – ये थी यूपी में दलों की सोशल इंजीनियरिंग, कौन होगा कामयाब?



Social Engineering Of Political Parties In Up Assembly Election

यूपी चुनाव को फतह करने के लिए सभी पार्टियों ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाया. बीजेपी, बीएसपी और समाजवादी पार्टी ने अपनी पुरानी इमेज तोड़ी है. लेकिन इस वक्‍त सबसे बड़ा सवाल यह है कि किस पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग कितनी कामयाब रहेगी?
सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रो. एके वर्मा कहते हैं कि तीनों बड़ी पार्टियों ने सोशल इंजीनियरिंग का अच्‍छा इस्‍तेमाल किया है. इसलिए एकतरफा परिणाम जैसे हालात नहीं दिख रहे हैं. बहुत कठिन स्‍पर्धा है. सोशल इंजीनियरिंग का मतलब जातियों को दिए जाने वाले टिकटों और पार्टी में उसके नेतृत्‍व से जुड़ा है. जिसने जिसे ज्‍यादा तवज्‍जो दी है उसे उसका उतना ही फायदा होगा.

मायावती ने अपने कोर वोटर दलित को छोड़कर अन्य जातियों को सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर लुभाना शुरू किया है. बीजेपी ने इस बार यादवों के अलावा अन्‍य पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित को साथ लाकर सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले का अच्‍छा प्रदर्शन किया है.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर एचके शर्मा कहते हैं कि बीजेपी ने इस बार इस मामले में काफी बदलाव किया है. यादवों के अलावा अन्‍य पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित को साथ लाकर सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले का अच्‍छा प्रदर्शन किया है.
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बीजेपी ने कुशवाहा समाज से केशव प्रसाद मौर्य को अपना प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया, अपना दल की अनुप्रिया पटेल के जरिए पटेलों को और भारतीय समाज पार्टी (भासपा) के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ओम प्रकाश राजभर के जरिए राजभर वोटों को साधने की कोशिश की.

बात करें बीएसपी की तो सबसे पहले यूपी में सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला इसी ने शुरू किया. मायावती ने अपने कोर वोटर (दलित) को छोड़कर अन्य जातियों को सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर लुभाना शुरू किया है.

अंबेडकर, पेरियार के विचारों को साधते हुए ब्राह्मणों को भी अपनी तरफ करने की कोशिश की. तिलक, तराजू और तलवार… वाले नारे को छोड़कर उसने ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा… को तवज्‍जो दी.
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दलितों की पार्टी ने सर्व समाज की पार्टी बनने की ओर कदम बढ़ाया. इस बार टिकट वितरण में भी मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का विशेश ध्‍यान दिया. सबसे ज्यादा 113 सीटें अगड़ी जातियों को दी. 106 ओबीसी, 97 मुस्लिम और सबसे कम 87 एससी कैंडिडेट को जगह दी. क्‍योंकि मायावती को पता है कि दलित वोटबैंक उसका है ही. लेकिन ध्‍यान देने वाली बात यह है कि इस बार सतीश मिश्र को पहले जैसी तवज्‍जो नहीं दी गई है, उसके कई पिछड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं.

शर्मा कहते हैं इस बार कांग्रेस ने शीला दीक्षित को चेहरा बनाकर अपने पुराने वोटर रहे ब्राह्मणों पर डोरे डालने की कोशिश की है. यह उसकी सोशल इंजीनियरिंग का ही हिस्‍सा है. एमवाई (मुस्‍लिम-यादव) समीकरण सपा के साथ दिखता है. साथ ही अखिलेश यादव की वजह से युवाओं का भी रुझान इधर हुआ है. ऐसे में यदि कांग्रेस और सपा दोनों के पाले में एक दूसरे के वोटबैंक की शिफ्टिंग हुई तो यह मजबूत गठबंधन साबित हो सकता है. हालांकि ऐसा दिख नहीं रहा.
एमवाई समीकरण से ही सपा ने यूपी में 2012 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल 73 सीटों में से 35 सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि बीएसपी को 13 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं. हालांकि मुस्‍लिम वोट बंटने की वजह से बीजेपी इन सीटों में 17 पर कब्‍जा जमा लिया था.

‘उत्‍तर प्रदेश विकास की प्रतीक्षा में’ नामक किताब लिखने वाले शांतनु गुप्‍ता कहते हैं कि सपा के एमवाई समीकरण में बीजेपी ने सेंध लगाने की कोशिश की है. मुस्‍लिम वोट को सपा और बीएसपी में बांटने में कामयाब दिख रही है. बीजेपी और बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग कामयाब दिख रही है. लेकिन समाजवादी पार्टी को एक बड़ी कामयाबी यह मिल रही है अखिलेश यादव बड़े नेता बनकर उभरे हैं.